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वर्तमान समय में महिला की असुरक्षा

निर्भया की माता आशा देवी का इस राजनीतिक व्यवस्था पर से भरोसा उठ चुका है क्योंकि अपराधी अभी तक जीवित हैं। इसलिए वह इस बार किसी भी पार्टी को वोट देने के पक्ष में नहीं हंै। 4 साल पहले भी उन्होंने यही कहा था कि जब तक मेरी बेटी के अपराधियों को फांसी नहीं हो जाती तब तक हमें न्याय नहीं मिलेगा। आशा देवी की परेशानी केवल अपने आप तक सीमित नहीं है, बल्कि वे कहती हैं कि शहर की सड़कें अब भी महिलाओं और बच्चों के लिए असुरक्षित हैं। सरकार ने महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रभावी उपाय नहीं किए। सीसीटीवी कैमरे अभी तक नहीं लगाए गए। और जो लगे भी तो वे काम नहीं करते। माएं अपनी बेटियों को के घर लौटने तक चिंतित रहती है।

By: वतन समाचार डेस्क
फाइल फोटो

डॉक्टर सलीम खान

 इस कलयुग का हाल यह है की हर खास और आम का नैतिक पतन हो चुका है। साधु और शैतान में कोई अंतर नहीं रह गया है। उम्र कैद की सजा काट रहे आसाराम बापू के बेटे नारायण साईं ने भी अपने बाप के पद चिन्हों पर चलते हुए अपने आपको उसी सजा का पात्र बना लिया है। सूरत की सेशन कोर्ट ने एक साध्वी के बलात्कार के केस में नारायण साईं को दोषी ठहराते हुए 30 अप्रैल 2019 को उसे उम्र कैद की सजा सुना दी। यह अत्यंत दुखद है कि बाप और बेटे ने दो सगी बहनों को अपनी वासना का शिकार बनाया। बड़ी बहन 1997 से 2006 ईस्वी तक आश्रम के अंदर आसाराम के अत्याचारों का शिकार होती रही और छोटी बहन 2002 से 2005 तक आसाराम के बेटे नारायण साईं की हवस का शिकार हुई। नारायण साईं को जिस समय सजा सुनाई गई वह जमानत पर था और उसका बाप आसाराम एक नाबालिग छात्रा के बलात्कार के अपराध में जेल में उम्र कैद की सजा काट रहा है। संभव है जल्द ही बाप बेटे एक साथ हो जाएं।

 

 16 दिसंबर 2012 की रात बलात्कार का शिकार होने वाली पैरामेडिकल छात्रा की मौत के बाद सभी राजनीतिक दलों ने उसके माता पिता को न्याय दिलाने के वादे किए थे। उस समय सत्ता की बागडोर अप्रत्यक्ष रूप से सोनिया गांधी के हाथों में थी और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित थीं। लेकिन ये दोनों शक्तिशाली महिलाएं भी निर्भया के माता-पिता को न्याय दिलाने में नाकाम रहीं। ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ की दुहाई देने वाले और ‘बहुत हुआ नारी पर अत्याचार, अबकी बार मोदी सरकार’ का नारा लगाकर सत्ता पर कब्जा करने वाले अपना समय पूरा कर चुके, लेकिन न्याय नहीं मिलना था नहीं मिला। इसलिए निर्भया के माता-पिता का कहना है कि अब वे इन वादों से थक चुके हैं क्योंकि उनके बारे में बातों से आगे बढ़कर कुछ नहीं किया जाता। निर्भया के माता पिता राजनीतिक दलों की सहानुभूति को राजनीतिक नौटंकी बताते हैं।

 

 निर्भया की माता आशा देवी का इस राजनीतिक व्यवस्था पर से भरोसा उठ चुका है क्योंकि अपराधी अभी तक जीवित हैं। इसलिए वह इस बार किसी भी पार्टी को वोट देने के पक्ष में नहीं हंै। 4 साल पहले भी उन्होंने यही कहा था कि जब तक मेरी बेटी के अपराधियों को फांसी नहीं हो जाती तब तक हमें न्याय नहीं मिलेगा। आशा देवी की परेशानी केवल अपने आप तक सीमित नहीं है, बल्कि वे कहती हैं कि शहर की सड़कें अब भी महिलाओं और बच्चों के लिए असुरक्षित हैं। सरकार ने महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रभावी उपाय नहीं किए। सीसीटीवी कैमरे अभी तक नहीं लगाए गए। और जो लगे भी तो वे काम नहीं करते। माएं अपनी बेटियों को के घर लौटने तक चिंतित रहती है।

 

 

 चुनाव अभियान के हंगामे में इन शब्दों में छुपे दर्द और निराशा को अनदेखा किया जा रहा है। सुशील शर्मा जिसने अपनी पत्नी के टुकड़े-टुकड़े करके तंदूर में डालकर जला दिया था, उसकी रिहाई के फैसले को सुनकर निर्भया के माता-पिता की चिंता और बढ़ गई है। उन्हें लगने लगा है कि अब यह संभव कि आगे चलकर निर्भया के हत्यारे भी उस दरिंदे के की तरह रिहा कर दिए जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ द रेयर ठहरा दिया था। अदालत के अनुसार मरने से पहले पीड़िता का बयान बेहद अहम और पक्का सबूत था, लेकिन हमारे समाज में कब किसको किस से सहानुभूति हो जाए कहा नहीं जा सकता। इसलिए ज्योति सिंह उर्फ निर्भया के पिता बद्रीनाथ सिंह का कहना है कि कुछ भी नहीं बदला। इस बार मुझे भी अपना वोट डालने जाने का मन नहीं है। सिस्टम में मेरा भरोसा डगमगा गया है एक अत्यंत गंभीर और विचारणीय पहलू है और यह कि किसी व्यक्ति की जीत या हार से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि हमारा देश बलात्कार के मामले में इस समय चैथे नंबर पर है। इसकी ओर अगर ध्यान नहीं दिया गया तो जल्दी ही बलात्कार के मामले में हमारा देश पहले नंबर पर भी आ सकता है।

 हमारे देश में शब्द ‘माता’ का प्रयोग बहुत किया जाता है। कोई भारत माता की जय का नारा लगाते लगाते नहीं थकता, किसी को गौमाता नजर आती है। संतोषी माता की आरती उतारने वालों की भी कमी नहीं। लेकिन असली मां बहन और बेटी की इज्जत सुरक्षित नहीं है। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर 20 मिनट में एक बलात्कार का मामला दर्ज होता है। प्रतिदिन 93 महिलाओं का बलात्कार होता है। इस मामले का बहुत दुखद पहलू यह है कि यह घिनौनी हरकत करने वाले 94 प्रतिशत लोग अजनबी नहीं बल्कि परिचित और जानने वाले होते हैं।

 

कुछ लोग यह समझते हैं कि शिक्षा और विकास से स्थिति को बदला जा सकता है लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि ‘मी टू’ आंदोलन चलाने वाली और अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का बयान करने वाली पढ़ी लिखी, उदार विचारधारा वाली महिलाएं थीं। और उनको अपनी हवस का शिकार बनाने वाले भी पश्चिमी सभ्यता के सभ्य वर्ग से थे। 2013 के आंकड़े से पता चला कि देश की राजधानी दिल्ली में महिलाओं पर यौन हमले सबसे अधिक हुए। दिल्ली के बाद दूसरे नंबर पर वित्तीय राजधानी मुंबई थी। उसके बाद पिंक सिटी जयपुर और फिर महाराष्ट्र की का शहर पुणे का नम्बर था। इन उस विभाग के जानकारों का विचार है कि केवल 46 प्रेतशत ऐसे मामलों की शिकायत पुलिस में की जाती है। जबकि एक विशेषज्ञ तो कहते हैं कि ऐसे अपराध के 90 प्रतिशत शिकायतें पुलिस तक नहीं पहुंच पाती।

 

 

 थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन नाम के एक विश्व संगठन में महिलाओं की सुरक्षा के लिए काम करने वाले दुनिया भर के 550 विशेषज्ञों से संपर्क करके एक विस्तृत आकलन प्रस्तुत किया। उसके अनुसार महिला असुरक्षा के मामले में भारत पहले नंबर पर पहुंच चुका है। आश्चर्य की बात यह है कि दुनिया का महान लोकतंत्र अमेरिका इस मामले में तीसरे स्थान पर है। वे उदार विचारधारा वाली महिलाएं जो विकास और कल्याण के मामले में पश्चिमी देशों को अपना अदर्श समझती हैं उनके लिए यह एक बहुत बुरी खबर है।महिलाओं के यौन शोषण के मामले में इससे पहले 2011 में इस तरह का जायजा लिया गया था। उस समय भारत की हालत इतनी बुरी नहीं थी। लेकिन बाद के 7 वर्षों में हमारे यहां महिलाओं की हालत बदतर होती गई और भारत महिलाओं की सुरक्षा के हवाले से खतरनाक देश बन गया है। 

 

 

.अभी हाल में यह रहस्य उद्घाटन हुआ है कि अमेरिकी सेना के अंदर महिलाओं पर यौन हमलों में वृद्धि बड़े पैमाने पर वृद्धि हुई है। इन हमलों का शिकार होने वाली की 17 से 24 साल की नई भर्ती होने वाली महिलाएं होती हैं। 2018 में किये जाने वाले एक अध्ययन के अनुसार 1 साल में यौन अपराधों के 20,500 घटनाएं दर्ज की गयीं, जबकि 2016 में यह संख्या 14,900 थी। बलात्कार की घटनाओं में 2 सालों के अंदर 38 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

 

 समाज में सबसे अधिक शक्ति सेना के पास होती है। उसके कई कारण हैं। अव्वल तो यह कि उसके पास हथियार होता है दूसरे यह कि वे नियमों के पाबंद होते हैं। उसके अलावा जनता और सरकार का संरक्षण भी उसे हासिल होता है। अब अगर उस संस्था में महिलाओं का शोषण होता हो तो अन्य संस्थाओं में और दूसरी जगहों पर क्या हाल हो सकता है। इन घटनाओं की शिकायत करने के मामले में भी अमेरिका की हालत बहुत अच्छी नहीं है। यानी हर 3 में से केवल 1 मामला उच्चाधिकारियों तक पहुंचता है। दो तिहाई महिलाएं  उसको चुपचाप सह लेती हैं। यह कोई दुष्प्रचार नहीं है और ना बदनाम करने की कोशिश है, बल्कि इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए 1 लाख कर्मचारियों से संपर्क किया गया है। विशेषज्ञ इस सर्वे पर 95 प्रतिशत तक भरोसा करते हैं।

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति वतन समाचार उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार वतन समाचार के नहीं हैं, तथा वतन समाचार उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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